हक़ कि आवाज़ सड़क से होते हुए संसद तक पहुँचती है… अपने क़लम और जुबान के धार को तेज़ कर लो अब हमारा यही रहनुमा होगाI

आज सीधी बात करूंगा सिर्फ हिन्दुस्तानी मुसलमानों से…..

हिन्दुस्तान में एक अर्शा गुज़र गया हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने खुले दिल से सड़क पर उतर कर अपने हक़ के आवाज़ को बुलंद नहीं किया और न ही किसी सार्थक मुद्दे पर एक जूटता दिखाईI सार्थक मुद्दे से मेरा तात्पर्य है शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, राजनीती एवम सामाजिक हिस्सेदारी आदि के लिएI

मुसलमानों के सड़क पर उतर कर अपने हक कि आवाज़ न उठाने का फायेदा समाज में धर्मनिरपेक्षता के कुछ ग़लत पैदावार खूब उठाते आए हैI हम भी बड़े शौक़ से अपने जिंदगी के हर फैसले के लिए उनपर आश्रित हैI पहले तो उन्होंने तय किया कि कहाँ रहना हैI फिर तय किया कैसे रहना है और बात यहाँ तक पहुँच गई के क्या खाना है और क्या नहीं खाना हैI अब दिन दूर नहीं के वो ये भी तय करेंगे कि कब घर से निकलना है और कब नहींI

और हमारा हाल ये है कि बड़ी क़ाफ़ और छोटी क़ाफ़ में फर्क़ करते करते पढ़ना लिखना तो दूर कि बात है होरूफ़ को पहचानना ही भूल गए हैI 43 प्रतिशत लोग सरकारी आंकड़े के मुताबिक ऐसे पाए गए जो अनपढ़ हैI ये सरकारी आंकड़े है हकीक़त क्या होगा ये बताने कि ज़रुरत नहीं हैI

शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, राजनीती एवम सामाजिक हिस्सेदारी आदि पर हमारी ख़ामोशी ही हमारे धार्मिक मामलो में किसी को हस्तक्षेप करने का मौक़ा देती हैI अगर हम इन मुद्दों पर अपने आवाज़ को एकजुट होकर बुलंद करे तो यकीनी तौर पर शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, राजनीती एवम सामाजिक हिस्सेदारी आदि का मसला भी हल होगा और फासीवादी ताकतों के तरफ से हमारे धार्मिक मामले में हस्तक्षेप भी करने कि हिम्मत नहीं होगीI

मैंने हमेशा महसूस किया है के हम मुसलमान हमेशा इस इंतज़ार में रहते है कि मेरे बदले कोई और बोल देगा और खुद को सार्थक मुद्दे पर खामोश रखते हैI हम हर जुर्म व ज्यादती को ये समझ कर बर्दाश्त करते चले जाते है कि हम तो  

                                                        إِنَّ اللّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ

के पढने वाले क़ौम है और हमें सब्र करना सीखाया गया हैI मै इनकार नहीं कर रहा हूँ कि हमें सब्र नहीं करनी चाहिएI मगर जुर्म सहना और हक़ कि आवाज़ बुलंद न करना तो सब्र नहीं हैI

याद रखे बीना सड़क पर उतरे अब कोई चारा नहीं हैI सड़क पर उतर कर अपने हक़ का मोताल्बा करने से गुरेज़ क्यों जब हमारे मुल्क का कानून और संविधान इसकी इजाज़त देता हैI दलित समाज ने खुद के आवाज़ को सड़क से संसद तक अपने जज्बे और अपने बलबूते पर पहुँचाया हैI किसी के सामने घुटने नहीं टेके और न ही अपने मसले का हल किसी और के नैतृत्व में तलाशा बल्कि खुद अपना नैतृत्व कियाI

हम जिसे अपना हमदम या रहनुमा मान कर बैठे है असल में वो बहुरूपिया है जो कभी धर्मनिरपेक्षता का चोला पहन लेता है तो कभी हमें ईद मिलन और इफ्तार पार्टी के नाम पर बहलाता फुसलाता है तो कभी अल्पसंख्यक कह कर हमे अपने हद में रहने को कहता है और डराता धमकता हैI मुसलमानों के शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, राजनीती एवम सामाजिक हिस्सेदारी के मुद्दे उन बहुरूपियों को नहीं सूझता मगर धार्मिक मामले में हस्तक्षेप करने में तनिक भी देरी नहीं करता हैI

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हमें उन दूसरे पर आश्रित न होकर और उन बहुरूपियों से सावधान होते हुए अपने आवाज़ में वो जोश वो ताक़त फिरसे लानी होगी जो जोश वो ताक़त मुसलमानों ने 1857 में अंग्रेज़ों के खेलाफ़ दिखाया था और सबसे पहले आवाज़ बुलंद करके अपने वातने अजीज़ हिंदुस्तान के लोगो को आवाज़ बुलंद करने का हुनर सिखाया थाI  

हक्क़ानीयत पर मर मिटने वाली कौम हमेशा दुसरे के हक़ कि वकालत करती रही हैI आज हम में इतना कूवत न रहा के हम अपने हक़ के आवाज़ को बुलंद करेंI नहीं हमें नीन्द से जागना होगा और अपने कलम और जुबान को तयार करना होगाI

हमारे क़लम और जुबान हमारे आवाज़ को सड़क से संसद तक पहुंचाएगीI अपने क़लम और जुबान के धार को तेज़ कर लो अब हमारा यही रहनुमा होगाI      

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मेरी क़लम से…………

                               रज़ा क़ादिर

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