इमामुल हिन्द मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को फिरसे जिंदा होना पड़ेगाI

वो दौर भी बदतर था ये दौर भी बदतर होता जा रहा है बस फर्क इतना है के उस दौर में हक कि आवाज़ बुलंद करने वाले का सर कलम कर दिया जाता था और आज हक कि आवाज़ बुलंद करने कि कुंजायिश होते हुए भी मुसलमानों के जुबान पे ताला पड़ा हुआ हैI

abul-kalam

मै बात उस दौर कि कर रहा हूँ जब होकुमते बर्तानिया का जुल्म पुरे हिन्दुस्तान पर बरपा थाI हक़ कि आवाज़ उठाने वाले का सर कलम कर दिया जाता थाI बग़ावत करने वालों कि ज़िन्दगी काल कोठरी के हवाले कर दी जाती थीI

उस दौर में भी शेरे-जीगर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने बड़ी बेबाकी से हक कि आवाज़ को बुलंद किया और लोगो को जगाया ख़ास कर मुसलमानों को ये एकसास दिलाया के

“कहाँ सोए पड़े हो तुमतो वो थे जो क़ैसरो-वो-किसरा का तख़्त तुम्हारे पावो में आए थे आज तुम अंग्रेज़ों के ग़ुलामी पे काने बने पड़े हो”I

आज फिरसे हिंदुस्तान के मुसलमान रंगीन खाबों में इस तरह मशगूल हो गए है कि इतनी फुर्सत नहीं के ज़रा गौर वो फिक्र करे अपने हालात पे, अपने तालीम पे, अपने सोच पे, अपने हक और जिम्मेदारियों पेI हालात यहाँ तक पहुँच गयी के हाल ही के जनगणना के रिपोर्ट से ये पता चला कि हमारे देश 42.7 प्रतिशत मुसलमान अनपढ़ हैI ऐसी और भी हैरत अंगेज़ डेटा हम आप बखूबी जानते हैI मगर हम इस क़दर आराम फर्मा रहे है जैसे मुर्दा कब्र में लेता होI एख्तेदार हमने बड़े शौक़ से उस के हाथ में देदी जिसे खून पीने का शौक़ होI

जिसने इस चमन को अपने खून से सीँचा हो आज उसका खून कोई और चूस रहा है और हम भी बड़े शौक़ से अपना खून का सौदा कर रहे है जुबान बंद रखने के बदलेI

हमें सबसे पहले इक़रा (पढो) सिखाया गया और इसी में सब मसले का हल हैI अगर हम तालीम हासिल नहीं करेंगे तो अपने हक को नहीं पहचान पाएंगे और हक़ को नहीं पहचान पाए तो हक़ कि आवाज़ भी बुलंद नहीं कर पाएंगेI

कुछ ही दीनो कि बात है एक साहब से मेरी बात हो रही थी तो उन्होंने ने एक अजीब बात मेरे सामने रख दिया कि

“इल्म सिर्फ कुरान है बाकी सब हुनर है, इल्म सीखना हम पर लाज़मी है हुनर नहीं”

गौर कीजिये इस बात पर के किस ओर जा रहे है हम मेरी नज़र में इसे मैं जेहालत ही कहूँगाI अगर इल्म से मुराद सिर्फ कुरान का पढना होता तो फिर ये क्यों कहा गया के

         “इल्म हासिल करने के लिए अगर चीन भी जाना पड़े तो जाओ”

ऐसी हालात में मुझे तो ऐसा लगता है कि इमामुल हिन्द मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के सोच को पढने पढ़ाने और आम करने कि सख्त ज़रुरत हैI मगर अफ़सोस हम इस बात को ढूँढने में मशगूल हो गए कि मौलाना आज़ाद किस मसलक के मानने वाले थेI

        हम क्यों ये भूल जाते है:

                        एक ही सब का नबी, दीन भी, ईमान भी एकI

                        हरम पाक भी, अल्लाह भी, क़ुरान भी एक..

                        कुछ बड़ी बात थी होते जो मुस्लमान भी एकII

ये वही आज़ाद है जिनके बारे में हसरत मोहानी ने कहा है

 “जब से देखि अबुल कलाम कि नसर…नज्मे हसरत में कुछ मज़ा न रहा”

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मेरी क़लम से…………

                               रज़ा क़ादिर

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