मुसलमान आतंकवादी होते है?

मेरे एक दोस्त ने कहा कि मेरे पापा कहते है कि तुम अभी बच्चे हो नहीं जानते ये मुसलमन आतंकवादी होते हैI

कुछ दिन पहले वही मेरा दोस्त डंके के चोट पर कहा करता था कि आतंकवादी का कोई मज़हब नहीं होताI कुछ ही दिनों में क्या ऐसा बदल गया कि वही दोस्त अपने पिता के हाँ में हाँ मिलाते हुए कह रहा है कि मुस्लमान आतंकवादी होते हैI मेरे इस दोस्त के बदले हुए सोच ने मुझे बहुत ही आश्चर्य में डाल दियाI मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मेरे इस दोस्त को अचानक क्या हो गयाI मै बहुत परीशान हूँI परीशान इस लिए नहीं कि मेरा दोस्त अचानक ऐसा क्यों सोचने लगा परीशान इस लिए हूँ कि वह इतना पढ़ा लिखा, सामाजिक सद्‍भावना को बढ़ावा देने वाला, धर्म जात-पात से ऊपर उठकर सोचने वाला तथा समाज को बदलने का सपना लेकर जीने वाला ऐसी मिथ्या धारणा से कैसे प्रभावित हो गयाI

हजारो तथ्य है मेरे पास जिस से साबित किया जा सकता है कि न ही मुसलमान आतंकवादी है और न ही इस्लाम धर्म आतंकवाद को बढ़ावा देता हैI मेरा दोस्त भी इसकी जानकारी रखता है मगर फिर भी मै कुछ तथ्य प्रस्तुत करता हूँ:

  • शायद मेरे दोस्त को ये नहीं मालूम कि पिछले 12 नोबेल पुरुस्कार में से 5 पुरुस्कार हासिल करने वाला मुस्लमान थाI
  • 1970 से लेकर 2015 तक लगभग 1,40,000 आतंकवादी हमले हुए पूरी विश्व में जिसमे 0.00009 % आतंकवादी मुस्लमान पाए गएI
  • 1980 से 2005 तक संयुक्त राष्ट्र में जितने आतंकवादी हमले हुए उसमे से 94 % आतंकवादी मुसलामन नहीं थेI

ऐसे और भी चौकाने वाले तथ्य मौजूद हैI मगर मेरा ये उद्देश्य बिलकुल नहीं कि मै ये साबित करू कि आतंकवादी कौन है और कौन नहींI मै तो बस अपने दोस्त को इतना बताना चाहता हूँ कि वह जो पहले सोचता था कि “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता” वही सच है बाकी मिथ्याI

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अगर बात करें अपने प्यारे देश हिंदुस्तान का तो इस बात से कोई मुकर नहीं सकता कि हिंदुस्तान शांति और सामाजिक सद्भावना का देश हैI वे लोग जो इस देश में रहने वाले को धर्म एवम जात-पात के आइने से देखते है एवम आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ते है वे लोग इस देश के हमेशा से दुश्मन रहे हैI ये बात भी मेरा दोस्त भली भांति जनता हैI मै उम्मीद करूँगा कि मेरा दोस्त इस देश के दुश्मनों के साथ कभी हाँ से हाँ नहीं मिलाएगाI

मेरे दोस्त मेरा मानना है के आतंकवाद के कई कारण है जिसमे धर्म भी एक कारण हैI मगर यहाँ पे धर्म का अर्थ सिर्फ और सिर्फ इस्लाम धर्म समझने की बेवकूफी न की जायेI सच्चाई यह भी है कि कोई भी धर्म आतंकवाद को बढ़ावा नहीं देताI

आतंकवाद हमारे सामने एक चुनौती है जिसे सामाजिक सद्भावना और एक जुटता से निपटा जा सकता हैI मेरा हमेशा से ये मानना रहा है कि आतंकवाद से निपटने के लिए समाज में निम्नलिखित बदलाव लाने बहुत ज़रूरी है:

  • अंतर्जातीय विवाह (marriage between people of different races, castes, or religions)
  • एक दुसरे के धर्म ग्रंथो को पढना और समझना और जो बाते समान हों और मानवता के कल्याण के लिए हों उन बातों को अपना लेनाI
  • साल में एक बार पंचायत स्तर पर सर्वधर्म मेला लगाया जाये जिसमे सामाजिक समरसता और सद्भावना के कार्यक्रम किये जायेI

अंतिम में मै अपने दोस्त से विनती करूँगा कि उसका जो सपना है समाज में बदलाव लाने का उसमे मेरे ऊपर दिए गए सुझावों को भी शामिल करले और ये भी न भूले के इस लेख को लिखने वाला एक मुसलमान है आतंकवादी नहींI

दोस्त अपने पापा को यह ज़रूर बताना कि तुम्हारे मुश्किल समय पर जो तुम्हारे साथ दिया करता है वो भी एक मुसलमान ही है आतंकवादी नहीं हैI

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मेरी क़लम से…………

                               रज़ा क़ादिर

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References:

http://www.novelprize.org

http://www.fbi.gov

http://www.start.uml.edu

http://www.thinlprogress.org

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