Shut Your Mouth! It is New India.

India will remain India it is not going to be NEW INDIA or OLD INDIA. Government may come Government may go but India will continue. It should be clear here that strength of India is its citizen not Government or any political party. India consist of each and every individual who has the citizenship of India whether he/she is religious, non religious, indigenous, non indigenous, rich, poor, educated, uneducated, followers of any political party, non followers of any political party, believers of Gau Mata or non believers of Gau Mata.

Citizen of India is bound to Indian constitution not to any political party, any organisation or any individual. Not only citizen but all the institutions, political parties, group of people who exist in India are bound to India constitution only.  No one can surpass the constitution of India knowingly or unknowingly whether he/she is cow lover or pig hater.

In the name of development decent voices should not be headed off, farmers should not be beaten brutally, Students should not be targeted for raising voices against any policies of Government, For the sake of vote Bharat Mata should not be allotted to Qabristan (graveyard) and Shamshan (crematorium) only. Ikhlaq and Pehlu khan should not handed over to wild wolf.

Is this the definition of New India where group of people are lynching someone in the name of Gau Mata, beating and assaulting to loving couples in the name of Anti-Romeo squads, killing someone in the name of Mandir/Masjid. Love Jihad, Anti Romeo like useless topics are the matter of debate on so-called progressive TV channels.  

Whatever the definition of New India, if it is disservice to the citizen of India then it is meaningless. India needs education, employment, research, technology etc. By re-naming the name of cities, institutions and scheme or by defending hate mongers, these needs are not going to fulfill.

We do not need NEW INDIA where farmers are forced to eat rat, where students are force to do suicide, where decent voices are suppressed, where opposing to Government policies and plan is treated as anti national, where animals are more important than human.

We need OUR INDIA where JUSTICE, LIBERTY, EQUALITY and FRATERNITY have been assured.

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मेरी क़लम से…………

                               रज़ा क़ादिर

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پرندے کی فر ياد……..علامہ اقبال

آتا ہے ياد مجھ کو گزرا ہوا زمانا
وہ باغ کی بہاريں وہ سب کا چہچہانا

آزادياں کہاں وہ اب اپنے گھونسلے کی
اپنی خوشی سے آنا اپنی خوشی سے جانا

لگتی ہے چوٹ دل پر ، آتا ہے ياد جس دم
شبنم کے آنسوئوں پر کليوں کا مسکرانا

pinjra

وہ پياری پياری صورت ، وہ کامنی سی مورت
آباد جس کے دم سے تھا ميرا آشيانا

آتی نہيں صدائيں اس کی مرے قفس ميں
ہوتی مری رہائی اے کاش ميرے بس ميں

کيا بد نصيب ہوں ميں گھر کو ترس رہا ہوں
ساتھی تو ہيں وطن ميں ، ميں قيد ميں پڑا ہوں

آئی بہار کلياں پھولوں کی ہنس رہی ہيں
ميں اس اندھيرے گھر ميں قسمت کو رو رہا ہوں

اس قيد کا الہی! دکھڑا کسے سنائوں
ڈر ہے يہيں قفسں ميں ميں غم سے مر نہ جاؤں

جب سے چمن چھٹا ہے ، يہ حال ہو گيا ہے
دل غم کو کھا رہا ہے ، غم دل کو کھا رہا ہے

گانا اسے سمجھ کر خوش ہوں نہ سننے والے
دکھے ہوئے دلوں کی فرياد يہ صدا ہے

آزاد مجھ کو کر دے ، او قيد کرنے والے!
ميں بے زباں ہوں قيدی ، تو چھوڑ کر دعا لے

علامہ اقبال

isbal

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मेरी क़लम से…………

                               रज़ा क़ादिर

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हक़ कि आवाज़ सड़क से होते हुए संसद तक पहुँचती है… अपने क़लम और जुबान के धार को तेज़ कर लो अब हमारा यही रहनुमा होगाI

आज सीधी बात करूंगा सिर्फ हिन्दुस्तानी मुसलमानों से…..

हिन्दुस्तान में एक अर्शा गुज़र गया हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने खुले दिल से सड़क पर उतर कर अपने हक़ के आवाज़ को बुलंद नहीं किया और न ही किसी सार्थक मुद्दे पर एक जूटता दिखाईI सार्थक मुद्दे से मेरा तात्पर्य है शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, राजनीती एवम सामाजिक हिस्सेदारी आदि के लिएI

मुसलमानों के सड़क पर उतर कर अपने हक कि आवाज़ न उठाने का फायेदा समाज में धर्मनिरपेक्षता के कुछ ग़लत पैदावार खूब उठाते आए हैI हम भी बड़े शौक़ से अपने जिंदगी के हर फैसले के लिए उनपर आश्रित हैI पहले तो उन्होंने तय किया कि कहाँ रहना हैI फिर तय किया कैसे रहना है और बात यहाँ तक पहुँच गई के क्या खाना है और क्या नहीं खाना हैI अब दिन दूर नहीं के वो ये भी तय करेंगे कि कब घर से निकलना है और कब नहींI

और हमारा हाल ये है कि बड़ी क़ाफ़ और छोटी क़ाफ़ में फर्क़ करते करते पढ़ना लिखना तो दूर कि बात है होरूफ़ को पहचानना ही भूल गए हैI 43 प्रतिशत लोग सरकारी आंकड़े के मुताबिक ऐसे पाए गए जो अनपढ़ हैI ये सरकारी आंकड़े है हकीक़त क्या होगा ये बताने कि ज़रुरत नहीं हैI

शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, राजनीती एवम सामाजिक हिस्सेदारी आदि पर हमारी ख़ामोशी ही हमारे धार्मिक मामलो में किसी को हस्तक्षेप करने का मौक़ा देती हैI अगर हम इन मुद्दों पर अपने आवाज़ को एकजुट होकर बुलंद करे तो यकीनी तौर पर शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, राजनीती एवम सामाजिक हिस्सेदारी आदि का मसला भी हल होगा और फासीवादी ताकतों के तरफ से हमारे धार्मिक मामले में हस्तक्षेप भी करने कि हिम्मत नहीं होगीI

मैंने हमेशा महसूस किया है के हम मुसलमान हमेशा इस इंतज़ार में रहते है कि मेरे बदले कोई और बोल देगा और खुद को सार्थक मुद्दे पर खामोश रखते हैI हम हर जुर्म व ज्यादती को ये समझ कर बर्दाश्त करते चले जाते है कि हम तो  

                                                        إِنَّ اللّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ

के पढने वाले क़ौम है और हमें सब्र करना सीखाया गया हैI मै इनकार नहीं कर रहा हूँ कि हमें सब्र नहीं करनी चाहिएI मगर जुर्म सहना और हक़ कि आवाज़ बुलंद न करना तो सब्र नहीं हैI

याद रखे बीना सड़क पर उतरे अब कोई चारा नहीं हैI सड़क पर उतर कर अपने हक़ का मोताल्बा करने से गुरेज़ क्यों जब हमारे मुल्क का कानून और संविधान इसकी इजाज़त देता हैI दलित समाज ने खुद के आवाज़ को सड़क से संसद तक अपने जज्बे और अपने बलबूते पर पहुँचाया हैI किसी के सामने घुटने नहीं टेके और न ही अपने मसले का हल किसी और के नैतृत्व में तलाशा बल्कि खुद अपना नैतृत्व कियाI

हम जिसे अपना हमदम या रहनुमा मान कर बैठे है असल में वो बहुरूपिया है जो कभी धर्मनिरपेक्षता का चोला पहन लेता है तो कभी हमें ईद मिलन और इफ्तार पार्टी के नाम पर बहलाता फुसलाता है तो कभी अल्पसंख्यक कह कर हमे अपने हद में रहने को कहता है और डराता धमकता हैI मुसलमानों के शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, राजनीती एवम सामाजिक हिस्सेदारी के मुद्दे उन बहुरूपियों को नहीं सूझता मगर धार्मिक मामले में हस्तक्षेप करने में तनिक भी देरी नहीं करता हैI

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हमें उन दूसरे पर आश्रित न होकर और उन बहुरूपियों से सावधान होते हुए अपने आवाज़ में वो जोश वो ताक़त फिरसे लानी होगी जो जोश वो ताक़त मुसलमानों ने 1857 में अंग्रेज़ों के खेलाफ़ दिखाया था और सबसे पहले आवाज़ बुलंद करके अपने वातने अजीज़ हिंदुस्तान के लोगो को आवाज़ बुलंद करने का हुनर सिखाया थाI  

हक्क़ानीयत पर मर मिटने वाली कौम हमेशा दुसरे के हक़ कि वकालत करती रही हैI आज हम में इतना कूवत न रहा के हम अपने हक़ के आवाज़ को बुलंद करेंI नहीं हमें नीन्द से जागना होगा और अपने कलम और जुबान को तयार करना होगाI

हमारे क़लम और जुबान हमारे आवाज़ को सड़क से संसद तक पहुंचाएगीI अपने क़लम और जुबान के धार को तेज़ कर लो अब हमारा यही रहनुमा होगाI      

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मेरी क़लम से…………

                               रज़ा क़ादिर

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इमामुल हिन्द मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को फिरसे जिंदा होना पड़ेगाI

वो दौर भी बदतर था ये दौर भी बदतर होता जा रहा है बस फर्क इतना है के उस दौर में हक कि आवाज़ बुलंद करने वाले का सर कलम कर दिया जाता था और आज हक कि आवाज़ बुलंद करने कि कुंजायिश होते हुए भी मुसलमानों के जुबान पे ताला पड़ा हुआ हैI

abul-kalam

मै बात उस दौर कि कर रहा हूँ जब होकुमते बर्तानिया का जुल्म पुरे हिन्दुस्तान पर बरपा थाI हक़ कि आवाज़ उठाने वाले का सर कलम कर दिया जाता थाI बग़ावत करने वालों कि ज़िन्दगी काल कोठरी के हवाले कर दी जाती थीI

उस दौर में भी शेरे-जीगर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने बड़ी बेबाकी से हक कि आवाज़ को बुलंद किया और लोगो को जगाया ख़ास कर मुसलमानों को ये एकसास दिलाया के

“कहाँ सोए पड़े हो तुमतो वो थे जो क़ैसरो-वो-किसरा का तख़्त तुम्हारे पावो में आए थे आज तुम अंग्रेज़ों के ग़ुलामी पे काने बने पड़े हो”I

आज फिरसे हिंदुस्तान के मुसलमान रंगीन खाबों में इस तरह मशगूल हो गए है कि इतनी फुर्सत नहीं के ज़रा गौर वो फिक्र करे अपने हालात पे, अपने तालीम पे, अपने सोच पे, अपने हक और जिम्मेदारियों पेI हालात यहाँ तक पहुँच गयी के हाल ही के जनगणना के रिपोर्ट से ये पता चला कि हमारे देश 42.7 प्रतिशत मुसलमान अनपढ़ हैI ऐसी और भी हैरत अंगेज़ डेटा हम आप बखूबी जानते हैI मगर हम इस क़दर आराम फर्मा रहे है जैसे मुर्दा कब्र में लेता होI एख्तेदार हमने बड़े शौक़ से उस के हाथ में देदी जिसे खून पीने का शौक़ होI

जिसने इस चमन को अपने खून से सीँचा हो आज उसका खून कोई और चूस रहा है और हम भी बड़े शौक़ से अपना खून का सौदा कर रहे है जुबान बंद रखने के बदलेI

हमें सबसे पहले इक़रा (पढो) सिखाया गया और इसी में सब मसले का हल हैI अगर हम तालीम हासिल नहीं करेंगे तो अपने हक को नहीं पहचान पाएंगे और हक़ को नहीं पहचान पाए तो हक़ कि आवाज़ भी बुलंद नहीं कर पाएंगेI

कुछ ही दीनो कि बात है एक साहब से मेरी बात हो रही थी तो उन्होंने ने एक अजीब बात मेरे सामने रख दिया कि

“इल्म सिर्फ कुरान है बाकी सब हुनर है, इल्म सीखना हम पर लाज़मी है हुनर नहीं”

गौर कीजिये इस बात पर के किस ओर जा रहे है हम मेरी नज़र में इसे मैं जेहालत ही कहूँगाI अगर इल्म से मुराद सिर्फ कुरान का पढना होता तो फिर ये क्यों कहा गया के

         “इल्म हासिल करने के लिए अगर चीन भी जाना पड़े तो जाओ”

ऐसी हालात में मुझे तो ऐसा लगता है कि इमामुल हिन्द मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के सोच को पढने पढ़ाने और आम करने कि सख्त ज़रुरत हैI मगर अफ़सोस हम इस बात को ढूँढने में मशगूल हो गए कि मौलाना आज़ाद किस मसलक के मानने वाले थेI

        हम क्यों ये भूल जाते है:

                        एक ही सब का नबी, दीन भी, ईमान भी एकI

                        हरम पाक भी, अल्लाह भी, क़ुरान भी एक..

                        कुछ बड़ी बात थी होते जो मुस्लमान भी एकII

ये वही आज़ाद है जिनके बारे में हसरत मोहानी ने कहा है

 “जब से देखि अबुल कलाम कि नसर…नज्मे हसरत में कुछ मज़ा न रहा”

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SUSTAINABLE DEVELOPMENT

Human is human

Nature is nature

As much as we developed

But we are not creature||

 

We need energy,

We need quality

Everything will be end,

So we need sustainability||

 

As much as we are cruel to nature

Still it helps us as it is wish of the creature

We are human, we have our end

For our security we need only sustainable development||

 

It only the truth we have to sustain.

Forget all technique

Forget all settlement

Let’s come together for sustainable development||

 

#APYF2016

मुसलमान आतंकवादी होते है?

मेरे एक दोस्त ने कहा कि मेरे पापा कहते है कि तुम अभी बच्चे हो नहीं जानते ये मुसलमन आतंकवादी होते हैI

कुछ दिन पहले वही मेरा दोस्त डंके के चोट पर कहा करता था कि आतंकवादी का कोई मज़हब नहीं होताI कुछ ही दिनों में क्या ऐसा बदल गया कि वही दोस्त अपने पिता के हाँ में हाँ मिलाते हुए कह रहा है कि मुस्लमान आतंकवादी होते हैI मेरे इस दोस्त के बदले हुए सोच ने मुझे बहुत ही आश्चर्य में डाल दियाI मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मेरे इस दोस्त को अचानक क्या हो गयाI मै बहुत परीशान हूँI परीशान इस लिए नहीं कि मेरा दोस्त अचानक ऐसा क्यों सोचने लगा परीशान इस लिए हूँ कि वह इतना पढ़ा लिखा, सामाजिक सद्‍भावना को बढ़ावा देने वाला, धर्म जात-पात से ऊपर उठकर सोचने वाला तथा समाज को बदलने का सपना लेकर जीने वाला ऐसी मिथ्या धारणा से कैसे प्रभावित हो गयाI

हजारो तथ्य है मेरे पास जिस से साबित किया जा सकता है कि न ही मुसलमान आतंकवादी है और न ही इस्लाम धर्म आतंकवाद को बढ़ावा देता हैI मेरा दोस्त भी इसकी जानकारी रखता है मगर फिर भी मै कुछ तथ्य प्रस्तुत करता हूँ:

  • शायद मेरे दोस्त को ये नहीं मालूम कि पिछले 12 नोबेल पुरुस्कार में से 5 पुरुस्कार हासिल करने वाला मुस्लमान थाI
  • 1970 से लेकर 2015 तक लगभग 1,40,000 आतंकवादी हमले हुए पूरी विश्व में जिसमे 0.00009 % आतंकवादी मुस्लमान पाए गएI
  • 1980 से 2005 तक संयुक्त राष्ट्र में जितने आतंकवादी हमले हुए उसमे से 94 % आतंकवादी मुसलामन नहीं थेI

ऐसे और भी चौकाने वाले तथ्य मौजूद हैI मगर मेरा ये उद्देश्य बिलकुल नहीं कि मै ये साबित करू कि आतंकवादी कौन है और कौन नहींI मै तो बस अपने दोस्त को इतना बताना चाहता हूँ कि वह जो पहले सोचता था कि “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता” वही सच है बाकी मिथ्याI

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अगर बात करें अपने प्यारे देश हिंदुस्तान का तो इस बात से कोई मुकर नहीं सकता कि हिंदुस्तान शांति और सामाजिक सद्भावना का देश हैI वे लोग जो इस देश में रहने वाले को धर्म एवम जात-पात के आइने से देखते है एवम आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ते है वे लोग इस देश के हमेशा से दुश्मन रहे हैI ये बात भी मेरा दोस्त भली भांति जनता हैI मै उम्मीद करूँगा कि मेरा दोस्त इस देश के दुश्मनों के साथ कभी हाँ से हाँ नहीं मिलाएगाI

मेरे दोस्त मेरा मानना है के आतंकवाद के कई कारण है जिसमे धर्म भी एक कारण हैI मगर यहाँ पे धर्म का अर्थ सिर्फ और सिर्फ इस्लाम धर्म समझने की बेवकूफी न की जायेI सच्चाई यह भी है कि कोई भी धर्म आतंकवाद को बढ़ावा नहीं देताI

आतंकवाद हमारे सामने एक चुनौती है जिसे सामाजिक सद्भावना और एक जुटता से निपटा जा सकता हैI मेरा हमेशा से ये मानना रहा है कि आतंकवाद से निपटने के लिए समाज में निम्नलिखित बदलाव लाने बहुत ज़रूरी है:

  • अंतर्जातीय विवाह (marriage between people of different races, castes, or religions)
  • एक दुसरे के धर्म ग्रंथो को पढना और समझना और जो बाते समान हों और मानवता के कल्याण के लिए हों उन बातों को अपना लेनाI
  • साल में एक बार पंचायत स्तर पर सर्वधर्म मेला लगाया जाये जिसमे सामाजिक समरसता और सद्भावना के कार्यक्रम किये जायेI

अंतिम में मै अपने दोस्त से विनती करूँगा कि उसका जो सपना है समाज में बदलाव लाने का उसमे मेरे ऊपर दिए गए सुझावों को भी शामिल करले और ये भी न भूले के इस लेख को लिखने वाला एक मुसलमान है आतंकवादी नहींI

दोस्त अपने पापा को यह ज़रूर बताना कि तुम्हारे मुश्किल समय पर जो तुम्हारे साथ दिया करता है वो भी एक मुसलमान ही है आतंकवादी नहीं हैI

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                               रज़ा क़ादिर

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References:

http://www.novelprize.org

http://www.fbi.gov

http://www.start.uml.edu

http://www.thinlprogress.org

Reaction of commercialization of Education in Bihar

Once upon a time Bihar was a central point of Education and knowledge at global level but now the situation is in danger zone. It did not happen fortuitously. There was a planed system working to take Education in danger zone deliberately not in Bihar only but also at country level or Global level.

There was a time when a matriculation passed out had ample of in-depth knowledge. During early 80’s if someone passed 10th exam with First Class (more than 60% marks) treated as more admirable and knowledgeable. But it is disheartening to see now that state toppers do not know about their subject name also. Reason is very simple, the quality of education going down day by day.

                    “Teachers teach for piece of paper that is money…

          Students also do study for a piece of paper that is certificate/degree”.

 

Recent toppers scandal in Bihar is not the matter of strange because it’s not new. If media will do more such stings, then approximately more than 60% of educational institutions have been found to indulge in same practice. Government is well aware about the worse situation of the level of education, despite knowing all the matter Government just watching drama as Silent spectator and helping the education mafia to make the education a saleable commodity.

There are various reasons for abysmal level of education in Bihar some major reasons are:

  • Costly private schools
  • Incompetent teachers
  • Unnecessary Political Interference in Educational system  
  • Go to school for freebies, not for education
  • Poor Infrastructure

Those who do advocacy that the performance of Bihar in education is good. I am putting some fact and data for them:

  1. A recent survey by National University of Educational Planning & Administration (NUEPA) has determined that only 21% of all primary school teachers in Bihar have completed the matriculation; or 10th standard.
  1.  According to one survey done by “Pratham”, most students studying in Classes V to VIII don’t even know how to read and write a simple sentence. Even many teachers were not in a position to write Hindi and English properly.
  1. Researchers have found that 37.8 percent of Bihar’s teachers could not be found during unannounced visits to schools, the worst teacher absence rate in India and one of the worst in the world.
  1. Many primary schools are running in hut.
  1. Only 43 percent of schools have separate kitchen for mid-day meal preparation.
  1. Eleven out of 21 districts have girls’ enrolment ratio below 50 percent of total strength of students.
  1. Only 34.76 percent have separate toilets for girls but some of them were locked.
  1. If we talk about state capital Patna, according to a survey, 1,665 children living in different localities were found doing child labour as they were living in slums. Thirteen percent of them were found to drug addict.
  1. it was found that only 21.24% schools had regular teachers while the rest were on contract basis.
  1. Only 10.95% schools had all weather classrooms.
  1. Report says most of the government colleges in Bihar are not offering regular classes to students.
  1. Higher educational institution has become strike Place.

I agree that Government initiated lots of schemes and programs for education and the percentage of budget in education is high but where is the outcome. Yes, the outcome is only attendance of students in primary education have been increased for collecting mid-day meal, Dresses by paying bribes and cycle at the end of the year of class. 

I agree too that students of Bihar have good participation in UPSC and Other Government exams. But I am arguing here that they choose UPSC and Government sector only because they have no other option. Some of them crack UPSC after lots of struggle or some of them do suicide.

At last I would like to say that Commercialization of Education is the root cause of every problem.

                       Education was the solution of every problem in life……

                       Now Education become problem for life.

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रज़ा क़ादिर

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References:

http://www.telegraphindia.com/1140915/jsp/bihar/story_18834821.jsp

https://en.wikipedia.org 

https://www.youtube.com

http://censusindia.gov.in/

http://www.educationbihar.gov.in/